Monday, March 23, 2015

कहाँ हूँ मैं ?


कुछ ब्लॉग पढ़ने वाले का पाठक मित्रों का सन्देश मिला। उन्होंने कई दिन से ब्लॉग पर मुझे न पाकर पूछ ही लिया परी जी आपने लिखना बंद कर दिया है क्या ? मन गदगद हो गया की मेरे पाठक मेरी रचनाओं की प्रतीक्षा करते हैं। माफ़ी चाहती हूँ मित्रों अबके ऐसा नहीं होगा फेसबुक पर पोस्ट करते-करते यहाँ के पाठको को निराश करने का खेद है मुझे।

मेरी कलम नहीं रुकेगी जब तक है जान जीने की वजह ही कैसे रोक सकती हूँ मैं। आगे से आपको निराश नहीं करुँगी समय समय पर पोस्ट करती रहूंगी। एक रचनाकार के लिए उसके पाठक उसके भगवान होते हैं वो नहीं तो हम नहीं। आप सबके सन्देश का शुक्रिया। आप स्वस्थ रहे खुश रहे और मेरी रचना पढ़ते रहे।

आप सबके समक्ष मेरी नज़्म प्रस्तुत है ......

तुम्हारे अना से टकरा कर टुकड़ा-टुकड़ा हूँ मैं
मानिंद की डायरी का पुराना पन्ना कोई फटा हूँ मैं
नज़्म हूँ कोई भूली-बिसरी जो तुझे याद नहीं
तेरी महफ़िलों का भी न कोई नाम-ओ-निशां हूँ मैं
हर सम्त मैं-मैं का सुनती हूँ कि धुँआ उठता है
हम के रास्तों में जाने कहाँ गुमशुदा हूँ मैं

बताओ! गुलाबी दुप्पटे के झांकती हुई
वो औरत अगर कोई और है
रातों में सेलफोन का दावेदार कोई है
तेरी लबों पे तलाश की प्यास अब भी बाकी है
ख्वाबों में भी तेरे महज़ मुकाम आया करते हैं
तुम्हारे महकती रोशन लव्ज़ों से अलावा फिर
अंधी-अपाहिज बुझी कसमें-वादों अलावा फिर
तुझमें दिखती नहीं ....न ही मेरे पास हूँ मैं
अगर कहीं नहीं हूँ तो फिर आखिर कहाँ हूँ मैं....!!


सर्वाधिकार सुरक्षित : परी ऍम. 'श्लोक'

12 comments:

  1. तुझमें दिखती नहीं ....न ही मेरे पास हूँ मैं
    अगर कहीं नहीं हूँ तो फिर आखिर कहाँ हूँ मैं....
    कई बार इंसान खुद से ही खो जाता है ... और भटकता है अपनी तलाश में यहाँ वहां जबकि वो होता है खुद के अन्दर ही ... खूबसूरत नज़्म ...
    ब्लॉग पे वापसी का स्वागत है ... मुझे लगता है ब्लॉग स्थाई है ... फेसबुक में कोई बुराई नहीं पर वो हवा का झोंका है ...

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  2. बहुत खूबसूरत वापसी..।।

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  3. तुझमें दिखती नहीं ....न ही मेरे पास हूँ मैं
    अगर कहीं नहीं हूँ तो फिर आखिर कहाँ हूँ मैं...
    इसे कहते हैं घर वापसी और वो भी जोरदार तरीके से ! बेहतरीन अभिव्यक्ति ! हालाँकि आपको फेसबुक पर भी पढ़ लेता हूँ किन्तु यहां और वहां बहुत अंतर है !!

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  4. वाह ! बहुत ही बढ़िया...

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  5. नवरात्रों की हार्दिक मंगलकामनाओं के आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल बुधवार (25-03-2015) को "ज्ञान हारा प्रेम से " (चर्चा - 1928) पर भी होगी!
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  6. बहुत खूब

    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पढ़े !

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  7. बेहतरीन लिखा आपने

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  8. बताओ! गुलाबी दुप्पटे के झांकती हुई
    वो औरत अगर कोई और है
    रातों में सेलफोन का दावेदार कोई है
    .........खूबसूरत वापसी

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  9. आह! बहुत ख़ूब कही!

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  10. तुझमें दिखती नहीं ....न ही मेरे पास हूँ मैं
    अगर कहीं नहीं हूँ तो फिर आखिर कहाँ हूँ मैं....!!
    इंसान खुद में ही खो कर अपने अस्तित्व को कहाँ कहाँ ढूंढने लग जाता है , अच्छी भावपूर्ण प्रस्तुति काफी दिनों पढ़ने को मिली आपकी रचना

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