Tuesday, June 23, 2015

रोज़ क्यूँ मैं बेहिस सी जिए जाती हूँ

ज़िन्दगी  खोयी  खोयी  सी  रहती  है 
और  मेरे  दोनों  हाथ  खाली  होते हैं 
साँसे  एक  बोझ  सी  लगती है   मुझे 
जिस्म कुछ हल्का-हल्का सा होता है 
रूह   पे   उदासी   की  घटा  छाती है 
आँख  फिर  जम  के  बरस  जाती  है 
रात  तेरी  यादों  के रस्ते  चलकर भी 
जब  निग़ाह  तुझको  न सुबह पाती है 
ख़्वाब   सब    झूठे    मुझे   लगते  हैं 
मैं    तह     से     उधड़     जाती    हूँ 
अरमां जब धुंआ-धुंआ से होते जाते हैं 
सोचने  लगती  हूँ  मैं  तब जुर्म अपना 
फिर   मोहब्बत   को  वज़ह  पाती  हूँ 
दिल को  बस  ये मलाल रहा करता है 
न   कोई    उम्मीद   न   ख़ुशी  बाकी 
और न तू ही हो  सका  मुकम्मल मेरा

फिर आख़िर  किससे वफ़ा निभाती  हूँ  
रोज़  क्यूँ   बेहिस  सी  जिए  जाती  हूँ 


© परी ऍम. 'श्लोक'  

6 comments:

  1. बहुत सुन्दर रचना, खुद से सवाल उठाते हुए

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  2. फिर आख़िर किससे वफ़ा निभाती हूँ
    रोज़ क्यूँ बेहिस सी जिए जाती हूँ

    बहुत सुन्दर वाह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह्ह

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  3. बहुत सुन्दर ....

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  4. आप की बेहतरीन रचनाओं पर नियमित टिप्पणी न कर पाने के हेतु खेद है । सादर

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  5. आप की बेहतरीन रचनाओं पर नियमित टिप्पणी न कर पाने के हेतु खेद है । सादर

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  6. अरमां जब धुंआ-धुंआ से होते जाते हैं
    सोचने लगती हूँ मैं तब जुर्म अपना
    फिर मोहब्बत को वज़ह पाती हूँ
    दिल को बस ये मलाल रहा करता है
    न कोई उम्मीद न ख़ुशी बाकी
    और न तू ही हो सका मुकम्मल मेरा
    क्या बात है ! आप इतना खूबसूरत लिखती हैं परी जी , दिल की गहराइयों तक पहुँच जाते हैं आपके शब्द

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