Monday, July 6, 2015

उस हरजाई का कोई पैग़ाम नहीं आता ( ग़ज़ल )

उस  हरजाई   का  कोई    पैग़ाम   नहीं  आता  
मैं त कती  हूँ  राह मगर  क्यूँ शाम  नहीं  आता  

करती है  लाखों   बातें  आँखें  उसकी   मुझसे 
जाने  क्यूँ  लब  पे   ही  मेरा  नाम नहीं   आता  

होगी  कुछ सच्चाई तो  कि धुआँ सा उठता है 
यूँ  ही  तो  सर  पर  कोई  इल्ज़ाम  नहीं  आता 

तुमसे  उल्फ़त ने  ही ये हाल  किया है  अपना 
दिल की किस्मत में वरना शमशान नहीं आता 

दूर खड़ा साहिल  पर बेहिस  तकता है मुझको 
हो मुश्किल चाहे कुछ  भी वो काम नहीं आता

ए इश्क़  तेरी  बस्ती  को कर ले  गम से खाली
इन गलियो में भी  दिल को आराम नहीं आता

कुछ  दर्द जवां  होकर तकलीफ़  बहुत  देते  हैं 
यूँ ही  तो हाथों  में अपने ये  जाम  नहीं  आता 


 © परी ऍम. 'श्लोक'  

12 comments:

  1. कुछ दर्द जवां होकर तकलीफ़ बहुत देते हैं
    यूँ ही तो हाथों में अपने ये जाम नहीं आता

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  2. भावमात्मक गुणवत्ता के बावजूद शिल्प के प्रति गंभीर होने की अति आवश्यकता है । शुभकामनाएं ।

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  3. करती है लाखों बातें आँखें उसकी मुझसे
    जाने क्यूँ लब पे ही मेरा नाम नहीं आता ...
    बेहतरीन ग़ज़ल .... कमाल का शेर है ...

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  4. आपको सूचित किया जा रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा कल बुधवार (08-07-2015) को "मान भी जाओ सब कुछ तो ठीक है" (चर्चा अंक-2030) पर भी होगी!
    --
    सादर...!

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  5. हर शेर लाजवाब है.... ग़ज़ल की विधा के साथ भावों की अभिव्यक्ति लाजवाब ....

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  6. सुन्दर अभिव्यक्ति.. बधाई

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  7. तुमसे उल्फ़त ने ही ये हाल किया है अपना
    दिल की किस्मत में वरना शमशान नहीं आता

    दूर खड़ा साहिल पर बेहिस तकता है मुझको
    हो मुश्किल चाहे कुछ भी वो काम नहीं आता
    बेहतरीन ग़ज़ल .... कमाल का शेर है ​परी जी

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  8. इश्क़ तेरी बस्ती को कर ले गम से खाली
    इन गलियो में भी दिल को आराम नहीं आता

    कुछ दर्द जवां होकर तकलीफ़ बहुत देते हैं
    यूँ ही तो हाथों में अपने ये जाम नहीं आता
    ...बहुत सुन्दर

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  9. बहुत सुन्दर रचना

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  10. हीरों की अंगीठी जलाइये जनाब
    कोयलों की भूल जाइए
    कोयले पे रोटियाँ पकती रहीं
    आप हीरों पर पका दिखाइये जनाब |

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