Thursday, February 5, 2015

पाषाण होना चाहती हूँ......


19 comments:

  1. पाषाण ही हैं इधर भी और
    उधर भी बिखरे हुऐ हम सभी
    कुछ कठोर कुछ मुलायम
    कुछ सुधरे हुऐ :)

    बहुत सुंदर ।

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  2. बहुत खूब कहा! पर इन सबके बिना कविता और कवि पैदा कहाँ से हो ?

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  3. पाषाण ही हैं इधर भी और
    उधर भी बिखरे हुऐ हम सभी
    कुछ कठोर कुछ मुलायम
    कुछ सुधरे हुऐ

    बहुत सुंदर शब्द परी जी

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  4. जीवन के यथार्थ का प्रभावी चित्रण ....मगर अगले मोड़ पर पाषाण होने की ख्वाइश को बदल दीजियेगा ....मंगलकामनाएं

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  5. बहुत सुंदर शब्द परी जी...

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  6. fir hume ye sab padhne kaise milega, bahut sundar likha hai

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  7. आज सच में संवेदनशील इंसान पत्थर ही होना चाहता है ...
    मन के जज्बात बाखूबी लिखे हैं ...

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  8. कलम की दीवानी में रवानी रच गयी |
    पाषाण बनने की कोई कहानी कह गयी|
    आकांक्षाएं इच्छाएं अनवरत बढ़ती गयी|
    आबरू आकाश सा साहित्य में उत्तर गयी ||

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  9. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल सोमवार (09-02-2015) को "प्रसव वेदना-सम्भलो पुरुषों अब" {चर्चा - 1884} पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  10. पाषाण ही हैं इधर भी और
    उधर भी

    ..........बहुत सुंदर परी जी

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  11. वाह ! क्या बात है ! लेकिन हमने सुना है संवेदनशील पत्थरों के सीने में भी दिल होता है और धडकनें वहाँ भी जज्बातों की लय पर गिनी जा सकती हैं ! सुन्दर चाह और उस चाहत की अभिव्यक्ति !

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  12. बहुत ही बेहतरीन रचना परी जी......

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  13. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  14. वाह क्या बात है .........बेहतरीन पंक्तियाँ .....जात पात के हवाओं ने जिसे छुआ न हो!!!!

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  15. bahut umda prastutui. . its always the pleasure to read your works. Baba bless !!

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  16. बहुत ही बेहतरीन रचना परी जी......

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