Friday, January 30, 2015

बच के रहना....

 
 
ख़्वाबों के देवताओं की बलि चढ़ाते हैं
अरमानों की चिताओं को तेज़ाब से जलाते हैं
रूह की नब्ज़ पर आरियां चलाते हैं
साँसों में कतरा-कतरा ज़हर घोल जाते हैं
कुचलते हैं हाथी पैर तले नाज़ुक से ज़ज़्बात
ऐतबार के तबस्सुम का खून पी जाते हैं
मनमर्ज़ी की मीनार जबरन अक्स पर बनाते हैं
बना के ज़रा सी बात को बवाल कहर ढ़ाते हैं
मासूम सी शक्ल लिए फिरते हैं फ़ज़ाओं में
अक्सर सीना ठोंक के दावे ये बेहिसाब करते हैं
जिनके साये गहरे तीरगी को भी हैरान करते हैं

बच के रहना की शहर में आज-कल
ऐसे लोग अपने आपको मर्द ज़ात कहते हैं !!
________________________
© परी ऍम. 'श्लोक'


13 comments:

  1. बहुत सटीक लिखी हैं परी जी


    सादर

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  2. जो अत्याचार करे स्त्री पर वोह मर्द कहाँ .....हर एक बिंब शर्मनाक है .....

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  3. सार्थक प्रस्तुति।
    --
    आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (01-02-2015) को "जिन्दगी की जंग में" (चर्चा-1876) पर भी होगी।
    --
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ...
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  4. सार्थक, सत्य, बेबाक कथन ! वाकई ऐसे लोगों से बच के रहने की सख्त ज़रुरत है !

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  5. सटीक .. पर ऐसे लोग मर्द कहाँ होते हैं ... धब्बा होते हैं मर्द के नाम पर .. बदनाम करते हैं पूरी मर्द-जात को ...

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  6. बहुत बढ़ि‍या लि‍खा है

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  7. आपका ब्लॉग मुझे बहुत अच्छा लगा, और यहाँ आकर मुझे एक अच्छे ब्लॉग को फॉलो करने का अवसर मिला. मैं भी ब्लॉग लिखता हूँ, और हमेशा अच्छा लिखने की कोशिस करता हूँ. कृपया मेरे ब्लॉग पर भी आये और मेरा मार्गदर्शन करें.

    http://hindikavitamanch.blogspot.in/
    http://kahaniyadilse.blogspot.in/

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  8. आज 04/ फरवरी /2015 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  9. बच के रहना रे बाबा!
    बहुत बढ़िया चिंतनशील रचना

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  10. बेहद शानदार चित्रण है ....... प्रगतिशील समाज का

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  11. रूह की नब्ज़ पर आरियां चलाते हैं
    साँसों में कतरा-कतरा ज़हर घोल जाते हैं

    बहुत बढ़िया

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  12. कुचलते हैं हाथी पैर तले नाज़ुक से ज़ज़्बात
    ऐतबार के तबस्सुम का खून पी जाते हैं
    मनमर्ज़ी की मीनार जबरन अक्स पर बनाते हैं
    बना के ज़रा सी बात को बवाल कहर ढ़ाते हैं
    चित्रों और शब्दों के माध्यम से आपने समाज की जो तस्वीर प्रस्तुत की है परवीन जी , दुखी कर जाती है ! उम्मीद है वक्त बदलेगा !

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