Wednesday, January 21, 2015

तुम किसी के बाप की जागीर नहीं हो


बिलख रही है
दुबक के किसी कोने में
रिश्तों के नाम पर
खिलौना बनी जा रही है
जज़्बातों की सूली पर
सुबह-ओ-शाम चढ़ी जा रही है
ताकतवर वज़ूद बनाया जिसे खुदा ने
रहम की रह-रह कर भीख जुटा रही है
जो खुद चिंगारी है
तिनकों से डरी जा रही है
बस एक बार खोलो खुद को
और झांको अंदर अपने
कि आखिर अबला-अबला चीखते-चीखते
तुम्हारी सबलता किसकदर मरी जा रही है
परखो खुदको...समझो खुदको
कमज़ोरी को निकाल बाहर करो
एक नया आग़ाज़ करो
समझा दो दुनिया को ठोंक बजा के
जुल्म-ओ-सितम को आँख दिखा के
कि
रेत की बनायी कोई तामीर नहीं हो
तुम किसी के बाप की जागीर नहीं हो !!!

___________________________
© परी ऍम. 'श्लोक'

22 comments:

  1. जो खुद चिंगारी है, तिनकों से डरी जा रही है ....धारदार, सुपठनीय

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  2. सुन्दर अभिव्यक्ति

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  3. जोश और ओज का ताप है शब्दों में, रचना सच्चाई को कुरेदती।

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  4. बहुत उम्दा !!!
    रेत की बनायी कोई तामीर नहीं हो
    तुम किसी के बाप की जागीर नहीं हो !!!

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  5. वाह धुवांदार शब्द ....

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  6. Kanpuriya bhasha me kahe to bahut Dhaanshu.

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  7. जागृती पैदा करनें वाली कविता।बेहद सुन्दर।

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  8. मर्मस्पर्शी प्रस्तुति

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  9. सही लिखा आपने ..............

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  10. बहुत खूब परी जी

    सादर

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  11. अच्छी रचना !
    बधाई

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  12. "रेत की बनायी कोई तामीर नहीं हो ..."
    Beautiful and well expressed Pari ! :)

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  13. बहुत दिनों बाद आपकी कविता पढ़ पाया... आपकी हर कविता प्रशंशनीय है

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  14. बेहद भावपूर्ण भारी कविता लिखी है आपने.
    new post http://iwillrocknow.blogspot.in/2015/01/dream-come-truebecome-ceo.html

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  15. बहुत संवेदनशील रचना ...

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  16. रेत की बनायी कोई तामीर नहीं हो
    तुम किसी के बाप की जागीर नहीं हो !!!

    बहुत संवेदनशील रचना ...

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  17. आज 28/जनवरी/2015 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  18. जो खुद चिंगारी है
    तिनकों से डरी जा रही है
    बस एक बार खोलो खुद को
    और झांको अंदर अपने
    की आखिर अबला-अबला चीखते-चीखते
    तुम्हारी सबलता किसकदर मरी जा रही है
    बहुत संवेदनशील रचना

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  19. बहुत बढ़िया ! झकझोर कर जगाती सशक्त अभिव्यक्ति !

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