Monday, August 17, 2015

उसने मुसलसल कई गुनाह किये

उसने मुसलसल कई गुनाह किये 
और अक्सर कहता रहा मेरी खता क्या है

उसे मालूम नहीं शायद 
चोरी गुनाह है और देखो 
उस अनाड़ी ने चुपके से मेरा दिल चुरा लिया
आफ़ताब से भी तेज़ था उजाला उसका 
कि उसने मेरे जिस्म का साया हथिया लिया  

उसे मालूम नहीं शायद 
धोखा-धड़ी गुनाह है 
उसने ऐतबार के मंदिर में 
प्यार का फूल चढ़ाया और कई कसमें खाई 
लव्ज़ दर लव्ज़ वादा किया 
और बिना आहट बिना आवाज़ के गुज़र गया 

उसे मालूम नहीं शायद 
कि क़त्ल की बड़ी सज़ा मुक़र्रर है 
उसने अपने हाथों से रात की गवाही में
चाँद का नूर लेकर टिमटिमाती तन्हाई में  
कई जिन्दा ख़्वाब मेरे आँखों की शीशी में भरे
और सुबह होते-होते बड़ी बेरहमी से उसे
ज़मीन पर पटक कर चकनाचूर कर दिया 

मैंने सबूत के क़ागज़ाद नहीं बटोरे 
मगर मेरा गमज़दा वज़ूद इस बात की गवाही है 

कि 
उसने मुसलसल कई गुनाह किये 
और अक्सर कहता रहा मेरी खता क्या है

© परी ऍम. श्लोक  




2 comments:

  1. सुन्दर रचना परी जी

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  2. उसे मालूम नहीं शायद
    कि क़त्ल की बड़ी सज़ा मुक़र्रर है
    उसने अपने हाथों से रात की गवाही में
    चाँद का नूर लेकर टिमटिमाती तन्हाई में
    कई जिन्दा ख़्वाब मेरे आँखों की शीशी में भरे
    और सुबह होते-होते बड़ी बेरहमी से उसे
    ज़मीन पर पटक कर चकनाचूर कर दिया
    इश्क की परिभाषा यही होती है ! सुंदर काव्य परी जी

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