Tuesday, November 25, 2014

फैसला ही तो था....


क्या सही ?
क्या गलत ?
फैसला ही तो था....
राह अपने लिए
बस चुना ही तो था....
मंज़िले न मिली
मोड़ रुस्वा रहे
जो मिला वो वफ़ा का
सिला ही तो था
हमको इनाम इश्क़ का
मिला ही तो था

छाले दिल की गली में
उभरने लगे
कदम दो कदम
एहसास चला ही तो था
किस बात का जश्न
मनाते भला
हर लम्हा नया
हादसा ही तो था
जिसने आज
ये घर जलाया मेरा
कल की चिलमन में दबा
शोला ही तो था
 
पास आई नहीं
खुशियाँ फिर कभी
साथ अपने दर्द का
काफिला ही तो था
हम गिला भी करें
तो किस्से करें
हर खता का इल्जाम
सर मेरे ही तो था...

उम्र भर महफिले
हम सजाते रहे
अपनी नज़्म में
उन्हें गुनगुनाते रहे 
'श्लोक' मगर हर दफा
तनहा ही तो था  

क्या सही ? क्या गलत? 
फैसला ही तो था .........!

_____________________

© परी ऍम. 'श्लोक'  

9 comments:

  1. जीवन है..इसी के तो रंग है...चाहना हो न हो..निबाहना तो है ही.

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  2. बहुत सुन्दर ! जब फैसला भी अपना ही हो तो गिला कैसा और किससे !

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  3. मन का हो तो अच्छा न हो तो अच्छा....हरिवंश राय बच्चन की कविता याद दिलाती हुई आपकी रचना ।

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  4. लाज़वाब …बेहतरीन... अहसासों का दरिया ही तो था !

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  5. फैसला ही तो था.... सुन्दर अभिव्यक्ति! आदरणीया परी जी!
    धरती की गोद

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  6. फैसला ही तो था.... सुन्दर
    अभिव्यक्ति!
    आदरणीया परी जी!

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  7. बहुत सुंदर..।।

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  8. क्या बात क्या बात

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  9. Faisla hi toh tha.. beautifully expressed Pari ! :)

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