Friday, November 7, 2014

तुम गए तो…कुछ यूँ हुआ!!


तुम गए तो…कुछ यूँ हुआ
लम्हा-लम्हा बेनूर हुआ
काटने लगे दिन-रात मुझे
दहशत में मेरा सुकूं हुआ
जज़्बातों ने आत्महत्या की
मेरे ख्वाबो का भी खूं हुआ
तुम गए तो....कुछ यूँ हुआ ....

यादों ने छालों से भर दिया जेहन   
खूब तमाशा-ए-आरज़ू हुआ
हमें हर शक्स ही धोखा लगा
वफाओं का जबसे हाल यूँ हुआ
झुलस ही गयी रौनकें सारी
हवायें भी गर्म लू हुई
तुम गए तो....कुछ यूँ हुआ

बेबस हम तमाशाबीन से रहे 
दिल की दुनियाँ जब धूं-धूं हुआ
तेवर फ़ज़ाओं ने बदला
तेजाब बारिश का हर बूँ हुआ
पतझड़ ने सुखाया इतना
सावन में भी न इक फूल हुआ
हम न जी सके और न मर सके
सजा मुकर्रर ही यूँ हुआ
तुम गए तो...कुछ यूँ हुआ
दर्द श्लोक-ए-पहलु हुआ 

 
 
 तुम गए तो...कुछ यूँ हुआ........!!

____________________
© परी ऍम. ‘श्लोक’

13 comments:

  1. दर्द को बयां करती सुंदर रचना..।।

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  2. बहुत खूब परी जी


    सादर

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  3. कुछ यूँ हुआ ,
    तेरे शब्दों को लबों
    ने छुआ
    तो सुकूँ हुआ।
    बहुत बहुत खूबसूरत अहसास और लफ़्ज़े बयां।

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  4. बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति है बेहद

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  5. जो कुछ हुआ बड़ा तकलीफदेह हुआ ! बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति !

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  6. This comment has been removed by the author.

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  7. भावात्मक एवं बेहतरीन :)

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  8. वफाओ का जबसे हाल यूँ हुआ
    झुलस ही गयी रौनके सारी
    सर्द हवा भी गर्म लू हुआ
    तुम गए तो....कुछ यूँ हुआ
    एकदम बढ़िया परी जी

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  9. पास कुछ भी नहीं दर्द ही दर्द है वो समझे नहीं तो हम क्या करें ,
    सुनके दर्द की दास्ताँ आपकी दर्द पागल हुआ तो हम क्या करें

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  10. जज़्बातों ने आत्महत्या की

    मेरे ख्वाबो का भी खूं हुआ

    ...बेहद उम्दा...

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