Tuesday, November 4, 2014

ऐसा क्यूँ है ?


ऐसा क्यूँ है ?
हम एक कोख से जन्मे
इक आँगन में खेले
इक जैसे सुख-सुविधा का भोग किया
इक तराजू के बराबर बाँट थे हम
लेकिन फिर नियति ने
हमारे बीच
कबड्डी के मैदान की तरह
लम्बी लाइन खींच दी
और तुम्हे नए रिश्तो के
ऐसे पहले में
ढकेल दिया गया
जहाँ तुम्हे बार-बार
हार स्वीकार करते हुए देखती हूँ
तुम्हारे शब्दकोष में जैसे
विरोध शब्द है ही नहीं
तुम सही हो या गलत
पर गलत ही होती हो
क्या इतना डर भर दिया है
समाज ने तुममें
कि तुम सही को सही
साबित करने से हिचकिचाती हो...
या फिर यह तुम्हारा इस रिश्ते के प्रति सम्मान है
 जिसे तुम अपने आतमसम्मान को
हार कर जीतती हो
तुम्हारा त्याद मेरे समझ में नहीं आता
संस्कार या तो तुममें हद से ज्यादा है
और मुझमे हद से ज्यादा कम
जो भी हो पर 
मुझे कभी-कभी अति लगती है
जब भी कोई ऐसा आलम बनता है
तो फिर सवाल
ज्वालामुखी कि तरह फूट पड़ते हैं
क्या सच में
इस बंधन के बाद
कोई विकल्प नहीं होता
वापिस लौटने का
क्या उस धधकती हुई अग्निकुंड में
स्त्री के अधिकार को डाला जाता है
क्या उस सिन्दूर में
केवल कर्तव्य भरा जाता है
जानती हूँ इनका जवाब
अनुभवों के हिसाब से होगा
और
मेरा अनुभव सदैव बुरा रहा
मैंने जितनी स्त्रियों को करीब से देखा
उन्हें लुढ़कता लौटा बना हुआ पाया
या फिर मैं कभी अच्छे अनुभव को
महसूस नहीं कर पायी
क्या ऐसी कोई दवाई नहीं
जिसका छिड़काव करने से
स्त्री को साधन समझने वाली
सोच का नाश हो जाए
जब ये डेंगू मच्छर हमें नहीं काटेंगे
तब कितना सकून हो जाएगा तुम्हे
और नजाने कितनो को
फिर तुम्हारे चहरे पर जो
लम्बी मुस्कान आएगी
मैं उसे हमेशा के लिए कैद कर लूँगी
तुम मुझे हँसती हुई न
 मेरी जान लगती हो !!

 ____________________
© परी ऍम श्लोक

9 comments:

  1. प्रभावी अभिव्यक्ति

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  2. परी जी आप बहुत भाग्यशाली हैं जो आपको लिखने की कला हासिल है ,मन के सच्चे उद्गारों को कागजों पर उड़ेल देती हैं ,पढ़कर हर नारी जगत की सोच का एक ही ख़ाका उजागर होता है

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  3. सच में एक नारी का सारा जीवन त्याग से परिपूर्ण होता है !
    बहुत अच्छी रचना !

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  4. The life of a woman and the path of sacrifices...:) beautiful.

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  5. अति सुंदर रचना , :)

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  6. नारी के मन की पीड़ा को एक नारी ही समझ सकती है ! विवाह के बाद एक स्त्री के जीवन में कितनी चुनौतियां आती हैं और उसे कितने समझौते करने पड़ते हैं इनका हिसाब रखना नितांत असंभव है लेकिन नियति की चाल को बदला भी तो नहीं जा सकता ! हृदयस्पर्शी रचना !

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  7. या फिर यह तुम्हारा इस रिश्ते के प्रति सम्मान है
    जिसे तुम अपने आतमसम्मान को
    हार कर जीतती हो
    रिश्तों को परिभाषित करते बेहतरीन अलफ़ाज़ परी जी

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