Sunday, December 21, 2014

हम मुफ़लिस लोग हैं...



कोहरे के शामियाने में रहते हैं
ओस का अलाव जलाते हैं
ठण्ड में ठिठुरते नहीं
तसल्ली की घूँट पी जाते हैं
गर्मियों की चिलचिलाती धूप ओढ़ते हैं
लू की सर्द हवा में लहराते हैं
सावन की बारिश में नहाते हैं
पतझड़ के तोलिये से जिस्म सुखाते हैं
 
जिंदगी क्या है ज़रा हमसे पूछो
जो हर शय में मुस्कुराते हैं
जो किसी से होता नहीं
हम काम वो कर जाते हैं
पेट भूख से भरते हैं
तन नंगाईयो से ढापते हैं
रात की चादर तानते हैं
सितारों पर सो जाते हैं
सियासत जब घूँघट खोलती हैं
तो दावों की नज़र से शरमाते हैं
 
हम मुफ़लिस लोग हैं 'श्लोक'
गिला करते नहीं ..अश्क भरते नहीं..
बड़ी तहज़ीब से जिंदगी के
हर मौसम का लुफ्त उठातें हैं !!


©परी ऍम. 'श्लोक'


23 comments:

  1. Kya baat hai . Samvadensheelta ki had hai ye .
    Bahut acchi lagi

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  2. परी जी ...आज की सदी में भी इन्सान की इतनी ख़राब दशा है ये सोच कर शर्म आती है लेकिन किसे पड़ी है सरकारें आती है जाती हैं और अमीर और अमीर हो जाते हैं और गरीब और गरीब ....आप की रचना प्रभावी और दिल को छूने वाली है ...सुभकामनाएँ

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  3. bahut hi achcha likha hai aapne pari ji...behatreen

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  4. Sansaar ke ek mahatvapoorn ansh ki ek samvedansheel prastuti. . Anoyher of your brilliant work... god bless

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  5. बहुत ही संवेदनशील अभिव्यक्ति....

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  6. वास्तव में सच्चे अर्थों में इंसान कहलाने के लिये सही दावेदार को बड़ी खूबसूरती और संवेदनशीलता के साथ आपने अपनी रचना में परिभाषित किया है ! परी जी आपकी इस रचना की प्रशंसा के लिये मेरे पास आज शब्द कम पड़ रहे हैं ! बधाई एवं शुभकामनायें !

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  7. बहुत ही संवेदना जगाती रचना.सियासतदानों के कोरे आश्वासनों पर जीते हैं लोग.
    नई पोस्ट : कौन सी दस्तक

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  8. आपने मन की बात यहाँ इस तरीके से लिख दिया जो शायद वो भी हमें शब्दों से इस प्रकार से अहसास नहीं करा पाते जो घर के छत के बजाय आसमान तले सोते हैं! हाँ वो आप जैसे कवयित्री को अपने ह्रदयस्पर्शी भावों से जरुर अहसास करा पाते है...परी जी सुन्दर रचना के लिए आभार!

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  9. मुफलिसी के कष्ट को आपने जिस अंदाज में बयां किया है वह काबिलेतारीफ है !एहसास और अभिव्यक्ति में सामंजस्य है !
    : पेशावर का काण्ड

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  10. ये हालात सदियों से नहीं बदले परी जी..आदमी कहाँ से कहाँ पहुँच गया लेकिन इन्सानियत आज भी दरवाजों के पीछे ही खडी है। एक इन्सान, एक कोशिश, एक बढ़ा हुआ, हाथ चन्द लम्हों में दुनिया बदल सकती है। अगर हर कोई ईमानदार कोशिश करे तो..आपकी लेखनी प्रभावशाली है..आपकी सोच सराहनीय है ।

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  11. जिंदगी क्या है ज़रा हमसे पूछो
    जो हर शय में मुस्कुराते हैं
    जो किसी से होता नहीं
    हम काम वो कर जाते हैं
    पेट भूख से भरते हैं
    तन नंगाईयो से ढापते हैं
    रात की चादर तानते हैं
    सितारों पर सो जाते हैं
    सियासत जब घूँघट खोलती हैं
    तो दावों की नज़र से शरमाते हैं
    सही कहा आपने परी जी ! जिंदगी का असल मायने क्या है , कोई इनसे सीखे ! भावनाएं जगाती सुन्दर रचना

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  12. जिंदगी का असल लुत्फ़ भी कुछ ऐसे ही लोग उठा पाते हैं ... पर फिर भी बदलते समय के साथ इनकी स्थति का भी बदलाव होना जरूरी है ...

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  13. सुन्दर प्रस्तुति आदरणीया परी जी! किसी ने लिखा है-
    "पत्थर उबालती रही माँ रात भर,
    बच्चे फरेब खा के जमीं पर सो गये"
    साभार!
    धरती की गोद

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  14. Behtareen rachna....pata nahi kab..inke jeevan mey badlav ayega

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  15. दिल को छूती बहुत मर्मस्पर्शी प्रस्तुति...लाज़वाब

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  16. बहुत ही खूबसूरती से सड़क के किनारे को शब्दों में उतारा है , ज़िन्दगी उनकी शब्द जहन से उतारा है !

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  17. kitni sachaai or khubsoorati se jee lete h apke shabd hr kahani ko...

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  18. हकीकत से रूबरू कराती कविता।

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  19. सुंदर और सार्थक अभिव्यक्ति...इस कड़ाके की ठंड में तो बेघर और गरीब तबके के लोगों की मुश्किलें और भी बढ़ जाती हैं. ऐसे दृश्य आम हैं, जहां खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर लोगों में बहुतों के पास ओढ़ने या खुद को ढकने को कंबल-रजाई तो दूर, तापने को सूखी लकड़ियां भी मयस्सर नहीं होतीं. ठंड की मार झेल रहे गरीबों के लिए किसी का दिल नहीं पसीजता. न सरकार का, न ही स्वयंसेवी संस्थाओं का...

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  20. वाकई बहुत सुन्दर और संवेदनशील रचना !!!

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  21. बहुत ही संवेदनशील अभिव्यक्ति...मर्मस्पर्शी प्रस्तुति

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