Wednesday, December 17, 2014

उखाड़ दो इनकी जड़ें..नहीं तो डाल दो हथियार


मुट्ठी भर लोग
हमपर इसलिए हावी हैं
क्योंकि
हमारा हुजूम
बेहद खोखला है
अंदर ही अंदर
ईर्ष्या का दीमक
इसे चाटता जा रहा है 
 

वरना उनमें
कूट-कूट कर
जिहाद के नाम पर
जितनी नफरत भरी गयी है
यदि हममें एकता के लिए
आधी भी मोहोब्बत होती
गर उनकी दहशत की..
क्रूरता की
आधी भी हममें
नेकी और ईमानदारी होती
भाईचारे का नाटक ख़त्म कर
यदि हम वाकई भातृभाव रखते

तो उनकी औकात क्या
की वो नज़र उठा
किसी देश की तरफ
ताक भी लें....
उनके हाथ में इतनी ताकत कहाँ
की उठायें हथियार दाग दें..
उंगलियो में इतनी जान कहाँ की
किसी की देश की
एक मक्खी तक मसल दें ...
चंद लोग जो हमारे फूंक से उड़ जायें
हमारी चुप्पी ने उन्हें अधिकार दिया है
कि वो हमें ही तबाह करते रहें
आतंकवाद किसी एक देश की समस्या नहीं
वे विश्व भर का संक्रमण है .. 

आओ! उठो ! एकजुट हो
उखाड़ दो इनकी जड़ें
जो इस्लाम के नाम पर
जिहाद के नाम पर
मौत का तांडव करते हैं

अगर नहीं तो डाल दो हथियार
करो आर या पार ...
मत करो कोई कारवाही
स्वीकार करलो आतंक की गुलामी  

कम से कम तब
बदले के नाम पर नहीं छीने जाएंगे
किसी माँ से उनके बच्चे ...!!
___________________________
© परी ऍम 'श्लोक'

19 comments:


  1. आओ! उठो ! एकजुट हो
    उखाड़ दो इनकी जड़ें
    जो इस्लाम के नाम पर
    जिहाद के नाम पर
    मौत का तांडव करते हैं
    .............................
    सही बात कही बहुत खूब कही

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  2. sach kaha apne.......apnane wali baat hai ye

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  3. bahut achhi aur sahi baat ki hai aapne pari ji ....

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  4. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल शुक्रवार (19-12-2014) को "नई तामीर है मेरी ग़ज़ल" (चर्चा-1832) पर भी होगी।
    --
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  5. सराहनीय चेतावनी - समय पर प्रतिरोध न किया गया तो व्यर्थ के शोरगुल और उछल-कूद से नहीं होनेवाला !

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  6. आओ! उठो ! एकजुट हो
    उखाड़ दो इनकी जड़ें
    जो इस्लाम के नाम पर
    जिहाद के नाम पर
    मौत का तांडव करते हैं
    सराहनीय!!!

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  7. आओ! उठो ! एकजुट हो
    उखाड़ दो इनकी जड़ें
    जो इस्लाम के नाम पर
    जिहाद के नाम पर
    मौत का तांडव करते हैं

    अगर नहीं तो डाल दो हथियार
    करो आर या पार ...
    ...........सटीक व सार्थक सामयिक प्रस्तुति

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  8. आप और हम कह रहे हैं बात यही कबसे—
    अब और इंतजार नहीं---

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  9. सार्थक रचना

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  10. बस हर बार हौसले काश के नीचे दबे चले जाते है।

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  11. सहमत। आतंकवाद एक विकृति है जिसका खात्मा जरूरी है। इंसानियत को जिंदा रखने और अमन-चैन के लिए आतंकवाद को नेस्तनाबूत करना ही होगा।

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  12. एकजुट तो होना ही पड़ेगा ,जितना जल्दी हो उतना ही अच्छा !
    सार्थक आक्रोश भरी अभिव्यक्ति !
    : पेशावर का काण्ड

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  13. होंसले और हिम्मत की जरूरत है ... जागने की जरूरत है बस ...

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  14. आतंक पर जीत हासिल करने के लिये पहले अपने ज़मीर को जगाना होगा ! अपने मन को दोगलेपन और लालच पर काबू पाना होगा ! अगर घर भेदियों की मदद ना मिले तो किसी आतंकी की हिम्मत नहीं हो सकती को देश में एक कदम भी आगे बढ़ा सके ! लेकिन हम अपने घर के शत्रुओं से ही नहीं निबट पाते बाहर से दुश्मनों की क्या कहें !

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  15. अगर नहीं तो डाल दो हथियार
    करो आर या पार ...
    मत करो कोई कारवाही
    स्वीकार करलो आतंक की गुलामी
    अभी दुनिया को इंतज़ार है ! जब खुद पर बीतती है तभी इस आतंक के दंश का असर मालुम होता है जैसे आतंक का पोषित रहा पाकिस्तान आज अपने ही किये की सजा पा रहा है !!

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