Wednesday, January 8, 2014

" मैं भारत की बेटी हूँ "


मैं भारत की बेटी हूँ ,,
उस भारत की
जिसके पास दीवारे तो हैं
पर छत नहीं.....
मेरे लिए आज़ादियाँ तो हैं
पर माहौल नहीं....

इसने कानून को पैदा किया पर  अन्धा ,,,
हाँ ! पर सुनता है लेकिन सबूत की भाषा ,,,
 
मेरे पिता भारत बहुत बेबस हैं
भारत माता  बहुत बेचैन
वो मुझे गोद में लिए रो रही है..
और बार -बार सिर्फ ये कहती है
की इस आवाम तुझे क्यूँ जन्मा मैंने !!

मेरे माता पिता देख रहे हैं 
अपने घर के हर  कमरे में 
हो रहे औरतो पे जुल्म को ,,

पर इनके हथियारों में जंग लग चुका है
और बाहर भ्रष्टाचार की 
जोरदार काली बूंदों की बारिश ,,,

मेरे पिता भारत बीमार हैं 
और फटे चुए चिथड़ो में बाहर जाते
की माँ ने उन्हें रोक लिया,,,

मेरे नासमझ माँ-बाप इंतज़ार कर रहे हैं 
ये बारिश थमने की ,,,
जो थामेगी  या नहीं  
सिर्फ एक सवाल है !!  

अगर हाँ तो कैसे ?
और अगर ना तो क्यूँ?
 
 
रचनाकार : परी ऍम 'श्लोक'
Year : 2013

मुझपे ही क्यूँ है आजमाइश सारी...

यूँ तो जिंदगी में कुछ नहीं मेरे निभाने को
गुज़ारिश तुझसे खुदा ये है बंद कर इस तराने को

खोया बहुत कुछ मैंने तेरे इस शहर में आकर
बाकी कुछ न रहा हसरतो में अब मेरे पाने को

दो गुल खिले थे बाग़ में वो पतझड़ ले झपटा
उसने भी खूब तलाशा बहाना मुझे छोड़ जाने को

अच्छा नहीं लगता मिज़ाज़ किसी भी आलम का
सन्नाटा खेद लेती हैं मुझे नोचकर कर खाने को

बनाने वाले बता मुझको मोम क्यूँ नहीं बनाया तूने
तब इक आग ही फाकी होती जिस्म मेरा पिघलाने को

मुझपे ही क्यूँ है लगातार ये तेरी आजमाइश सारी
ज़माना कम पड़ा क्या तुझको सबक हर दिन सिखाने को


ग़ज़लकार: परी ऍम 'श्लोक'
Dated :08/01/2014

Tuesday, January 7, 2014

समय लूट गया सूती धोती...

कहाँ भाग्य में मोरे मोती
काग खा गया हीरे कि गोटी
दोष तोहरा है और न ही सखी मोरा  
समय लूट गया सूती धोती !

आज माता कुमाता बन गईन
बाप बेच दिहिन लालच मा बेटी
हमरे घर का चूल्हा बुझान
लोग जालाए लिहिन ख़ुशी मा जोति !

कौन अपराध का भोगे खातिर
जनम धरती पर दिहिव रूप नारी
ऐतने जुगत से बटोरेन लज्जा
सास मिटाय दिहिन दय-दय गारी !

सोच-विचार कर मन घबरावे
इ कइसन जुग दउरा चला आवे
पाहिले अहिंसा धर्म का मूल रहा
आज इंसान इंसान नोच खावे !

हर कोई शराब - अफीम मा डूबा
घुमावे के खातिर मांगे महबूबा
नंगा होई गए प्रेम भाव सब
अश्लीशता बन गया नया अजूबा !

सेठ कय कुकुर नीक-नेउर खाय
नन्कू कये बिटिया भूखी सोया जाए
कोई महल बनाय रहत दस कमरा में
कई चिथरा पहिने फूटपाथ पर जीवन बिताय !

हमरे कलम कए धार है नोकी
पन्ना पर सब सच ही सच झोकी
गाड़ दियो ज़मीन मा सोचे कि क्षमता
या दई दियो नेकी का बादर कए चोटी !


Written By : Pari M 'Shlok'
Dated : 08/01/2014

वक़्त के कब्र में दफ़न हर सच्ची कहानी है.....

ये दुनिया इतनी झूठी है दिखावे कि दीवानी है
आँखो से लहू निकला वो बोल बैठे कि पानी है

जरकन कि चमक देखा खरीद लिया समझ हीरा 
तजुर्बे कि कमी है ये या फिर उम्र कि नादानी है

नज़रिये का फेर है यारो बात और कुछ भी नहीं है
किसी कि सीरत से यारी है किसी को सूरत प्यारी है

नुमाइश ही तो करती है ये कोठियाँ अमीरो कि
अंदर झाँख कर देखो फकीरो से भी भिखारी हैं

किसके बीच साबित करूँ अपनी हुनर कि शोखियाँ
जिसकी जेब खनकती हैं आज वही तो ज्ञानी है

लदा है बारूद सीने में जुबां पर प्रेम कि बानी है
बेमान वक़्त के कब्र में दफ़न हर सच्ची कहानी है

मिलता नहीं ग़ज़लो को भी अखबारों में पहला पेज,
बंद किसी डायरी कि 'श्लोक ' से ये शिकायत पुरानी है



ग़ज़लकार: परी ऍम 'श्लोक'
Dated : 07th Jan, 2014

"तुम वास्तव में हो कौन"??


होंठो कि गुलाबी
नरम पंखुड़ियों पर
पानी का छीट भी मोती
सा बन बैठता है तुम्हारा नाम
झंकार सा बजने लगता है
अंतर्मन में किसी भी बेला में...
भूले से जिह्वा छोड़ देती है
जब तब किसी परचित पर
तुम्हारी पुकार का बाण...
जब वो अचम्भित होकर
संदेहिता से ताकता है
तो खिसिया मूड़ नीचे झुका लेती हूँ..
अजब-गज़ब कहानी बन जाती है
सखियो के जत्थों के बीच
ठिठोली बना लेती हैं मेरा
हर चित्तवृत्ति पर घेराव
करने लगते हैं सभी..
कई बार अभिप्राय को जोड़ने घटाने में
मैं स्वयं भी निरा-आधार हो जाती हूँ..
घटाओ को देख मोर बन नाचती हुई 
अचानक भापने लगती हूँ
अपने भाग्य के पाँव को तब
गठिया जाती हूँ शून्य हो जाती हूँ...
परन्तु तुम्हारा सन्देश
उमंग और लालसा का रस भर देता है
इन सब गुद-गुदाहट कि अकपट...
और मैं पलक झुका शर्म से लाली भई
कह ही देती हूँ सामने रखे दर्पण में देख
"तुम वास्तव में हो कौन"??



रचनाकार : परी ऍम 'श्लोक'
 

Monday, January 6, 2014

"ख़ाक हो जाने दो"

तुम मुझे ख़ाक हो जाने दो
बहुत जली हूँ अब राख हो जाने दो
कैसे समझाऊं उदासियाँ
कितनी सर चढ़ी हैं?
घटायें तेरी याद कि 
जबसे बरस पड़ी हैं
तैर कर उबलती लहरो से
किनारो से बात हो जाने दो..
बहुत जली हूँ अब राख हो जाने दो!

करवटो से टूटती है
मंज़िलो कि आस
सलीबों पर टांगा हुआ है
मेरा गूढ़ विश्वास
धागो से रिश्ते को चरखी पर
कातती गयी टूटता गया
कतरा था या रेत था
जितना सम्भाला उतना छूटता गया
पर्वतो को पार कर आकाश हो जाने दो
बहुत जली हूँ अब राख हो जाने दो!

हरियाई घास बाग़ कि पिली भात हो गयी
संवेदना के पेड़ कि टूटी शाख खो गयी
नवीन सृजन की संभावनाएँ
अस्त-व्यस्त रह गयी
पुतला जैसे माटी का मैं
रह-रह टूटी और डह गयीं
बची-खुची मंशा का अंतिम उपहास हो जाने दो
बहुत जली हूँ अब राख हो जाने दो!!
 
रचनाकार : परी ऍम 'श्लोक'
 

खुदको खोने का उपहार दूँगा....

वो जाते हुए कह गया मुझे
अगले जनम स्वप्न साकार दूँगा
इस जनम तू मैली हो गयी गंगा
उस जनम तोहे मुझमे विस्तार दूँगा !

तू काट जीवन इसी पीड़ा में
मैं ना जियूँगा ना तुझे आबाद करूँगा
निकलूंगा नहीं भीतर से बाहर
ना ही तुझको स्वीकार करूँगा !

तू कैसे बुझायेगी प्रीत का दीपक
मैं प्रेम का आग पसार दूँगा 
तू भीगेगी खड़ी किनारे पर भी
सारी विवशता तुझपे उलझार दूँगा !

घोर-घोर सोचेगी मोहे गीतो में गायेगी
सोच भला वो पगली लड़की मुझको कैसे भुलाएगी
प्रकृति के हर कोने को स्पर्श से अपना कर लूँगा 
हर झोके में खुद के चाहत कि महक उतार दूँगा !

तू मेरे मुक्तक कि बोलो में है  
कविताओ के शब्दो में है शामिल
शायरी के दर्दी बयान में तू ही तू है
कम कथन नही हैं मेरे पास ''मैं कैसे भी तुझे पुकार लूँगा !

वृक्ष कि छाया बन कर प्यारी
चुभती धूप से तुझे बचाऊंगा
तुझसे दूरी का नाप-तोल
फिर भी कम न कर पाउँगा
मैं अपनी कारतूसी काया पर संयम का पानी डार लूँगा !

तारे टूटे तो मांगना मुझको
चाँद बीच ताड़ना मुझे, टटोलते रहना अंधियारे में,
कभी ताबीज़ में देखना तस्वीर, ढूँढना मुझे सिरहाने में  
मैं इस युग में तुझको आजीवन खुदको खोने का उपहार दूँगा !



 
रचनाकार : परी ऍम 'श्लोक'
Dated : 07/01/2014

"तोहरी याद में लीन भई हम"

मैं बन जोगन यूँ वन-वन भटकूँ
तेरे जिह्वा के हर शब्द में अटकूँ
सीप बन उतरूं हरी पात छवि पर
लिओ जो हाथ मोहे मुट्ठी से छटकूँ

मोम बनु तो मोहे तपन पिघलाय 
आग बनी हर चूल्हे में धधकूं
झूठ बनू तो गंध नेक न जाय
सच बनू तो हर नज़र में खटकूँ

का करूँ समझ किधर बीजू मैं
कौन से बूझ के भीतर बजकुँ
हर मन पत्थर के शिला मतिन है
पाय कहाँ सज्ञानी बोध में लटकूँ

सुबेर सपना मुर्गे कि बाग़ तोड़ दिहिन
रात थकावट के चोट से चटकूँ
तोहरी याद में लीन भई हम
बूँद-बूँद आंस लई उंगली से झटकूँ

हसी हमरी खो गयी कौन गली मा
ढूंढे खातिर हर शहर में भटकूँ
पाऊँ धोका का भेट रह रहिके
माथा अइसन चट्टान पर पटकूँ


रचनाकार : परी ऍम 'श्लोक'
Dated : 06 January, 2014

Sunday, January 5, 2014

कलयुग के आदमी कि नीयत बिलकुल भेड़ियाई है......

चिंगारी भड़क उठी है मुझमे, आग तुमने लगायी है
घुटन से झूझती हुई 'सभ्यता' कि परछाई है
अस्मिता औरत का था जो इक वक़्त पर जान से अज़ीज़
वैश्याएं उन्ही को चीज़ सा हर जगह बेच आयी हैं

स्कूलो में किताब सैक्स कि अब नयी लगवायी है
नैतिकशिक्षा के टुकड़े चौराहो पर बहायी है
निकल आयी मेरे जुबान से हाय ! ये देख कर
कल के बच्चे ने आज नयी गर्ल फ्रैंड बनायीं है

गुजर जाती है सन से हवा संग खौफ लायी है
जाने क्यूँ मेरी हिम्मत लगती मुझको जंगाई है
बन्द कर लेते हैं दरवाजा गली में तमाशा देख
कलयुग के आदमी कि नीयत बिलकुल भेड़ियाई है

यूँ तो आसान बहुत इंटरनेट से कमाई है
दुनिया सोशल नेटवर्किंग से बहुत पास आयी है
उलझा जो इसकी लत में तो हासिल दहशत हुआ
लटका हुआ पंखे से देखो नीना का भाई है
 
देखो ये क़यामत चल के पच्छिम से आयी है
सूरज कि लाली डूबी लाइट जगमगायी है
जहन पर छोड़ता है चमक अपने पहनावे का
मेरी मुनिया भी मिनी स्कर्ट के पीछे बौराई है
 



रचनाकार : परी ऍम 'श्लोक'
 

Saturday, January 4, 2014

"असलियत"


इक दौर निकल जाने के बाद मेरी दोस्त  सुन
हासिल अफ़सोस के नज़राने के सिवा कुछ नहीं मिलता..

तब्दील हो जाए कोई फैसला जब शज़र-ए-कांटो में
नाज़ुक दिल को घावो के सिवा कुछ नहीं मिलता..

किस ओर निकल जाऊं कि आराम पहलुओ में आ जाए
मुझे खुद कि दीद में भी नफरत के सिवा कुछ नहीं दिखता..

हर शख्स सना हुआ लगता है धोखे कि राब में
हसीन चेहरो में नकाबो के सिवा कुछ नहीं मिलता..

बेबसी कि रेत पसरी है सेहरा कई मुद्दत से सवाली है
प्यास के नाम पर फुवाहारो के सिवा कुछ नहीं मिलता..

कहाँ खिलता है इस चमन में बेमकसदन गुलाबी फूल
ख़ूनी नियत में औज़ारो के सिवा कुछ नहीं मिलता..

तोड़ती जा रही है बुलंदियों के लिए वायदे मशगूल सी दुनिया
हसरतो के बाज़ार में बीमारो के सिवा कुछ नहीं मिलता..

ये तजुर्बा उम्र का कानो में चीखता बहुत है आज-कल
'श्लोक' कि तकदीर को दरारो के सिवा कुछ नहीं मिलता..


ग़ज़लकार: परी ऍम 'श्लोक'
Dated : 04/01/2014

"सियासत कि जादुई कुर्सी"

क्या होता है सियासत कि कुर्सी में?
जिसपर बैठते ही
पहाड़ पर चढ़े गिरगिट सा
रंग बदल जाता है
फिर धीरे-धीरे फैलाने लगती है
लालच कि लोमड़ी अपने नुकीले पाँव
कुचला जाने लगता है
दावो कि मेंढक को
जो चुनाव के बरसात के दौरान
निकल के जनहित-तालाब को घेर लेती है
भरने लगते हैं बरसो से सूखा कुआं
काले धन के अपारदर्शी पानी से
उलट हो जाता है गली से चंदा बटोरते भिखारी भी  
सफ़ेद कुरता-पाजामा पहन के नेता बनते ही
अज्ञानी भी बड़ी-बड़ी बाते करते हैं
बिन आधार कि बातें....
क्या होता है आखिर उस कुर्सी में?
जहाँ बैठते ही कुंठित मानसिकता का
असभ्य व्यक्ति भी सब वी.आई. पी हो जाता है
जिद्द उनके दिमाक के
मुंडेरे पर चढ़ जाती है
फिर आम आदमी से भय हो जाता है
जिसके हाथो कि मोहर उन्हें तख़्त कि भेट देती है
कैसी गुमनाम गली है सियासत कि
भीतर काला-नीला-लाल होता है
परन्तु जुबान पर चमकती भाषा...
इक आम आदमी को
हम भगवान् बना देते हैं
वोही जनता कि इच्छाओ को
कीड़ो कि तरह मसलते चलते हैं..
यहाँ पहुँच कर भीगी बिल्ली भी
सवा शेर हो जाती है..
आखिर ऐसा...
क्या होता है सियासत कि कुर्सी में???


रचनाकार : परी ऍम 'श्लोक'
Date : 04th Jan, 2014
 

Friday, January 3, 2014

!!मेरे लहू में खुद को नामजद इक दबंग कर गया!!


!!जीवन युद्ध!!

मैं जीवन कि रणभूमि में हूँ
रिश्तो के चक्रव्हीव् से घिरी हुई
भावनाओ के तीरो से लदी हुई
प्रेम के सारथि के साथ खड़ी हुई
यहाँ हर साधन मौजूद हैं
साम-दाम-दंड-भेद...
जीत कि इस आपसी होड़ में
अपनी चूके निशाने को सही दिशा देती हुई
छल-कपटों के मध्यस्त घायल अवस्था में
बिना विश्वास पात्र सैनिक के अकेली
निरंतर जीवन युद्ध लड़ रही हूँ..

 
रचनाकार : परी ऍम 'श्लोक'
Dated : 3/1/2014…
 

 

कोई बोल गया " मैं तनहा हूँ"


Thursday, January 2, 2014

हो सके तो इस शहर से ले जाइयेगा हमें


हो सके तो इस शहर से ले जाइयेगा हमें
हम हिना को हथेलियो में रख के गाढ़ा कर लेंगे..
 
तेरे ठोकरो को सज़दा करेंगे ता-उम्र इश्क़ में
शोहरत कि महफ़िलो से किनारा कर लेंगे
 
कुछ अंजाम दे जाओ सिवाय बेवफाई के
ये बाशिंदे वरना हमें इंसान से अंगारा कर देंगे
 
हर नज़र कुरेदती रहेगी जख्म नासूर सीने का,
पसीने का पानी भी गुनाह-ए-तिजारा कर देंगे
 
ग़ज़लकार : परी ऍम 'श्लोक'
Dated : 3/01/2014

"भूख"

कैसे भूल सकती हूँ?
गरीबी का हुक्का पीते वो दिन
अधटूटा माटी का दरारी दीवार
और तूफ़ान के साथ उड़ गया
पुराने छपरे का ज्यातर हिस्सा...
टपकते बूँद के नीचे मज़बूरी में भीगना
और मौसम को कोसते रहना
टूटी खटिया पर रात भर
बिना सोये करवट बदलना
भाई का रोना खाली पेट में उठती उथल-पुथल से
खाने के लिए जिद्द बाँध देना
चूल्हे का कई-कई हफ्ते लिपा पुता यूँ पड़े रहना
कौड़ी-कौड़ी कि मोहताज़ग़ी,
नीक-नेउर खिलाने के लिए
नइहर जाने के आमंत्रण का इंतज़ार..
पाला पड़ते ठण्ड में नंगे पाँव नन्ही का स्कूल जाना..
माँ... वो फटा हुआ तेरा आँचल
आँखों से आंसुओ कि धार में टपकती तेरी बेबसी
लटका हुआ तेरा मासूम चेहरा
कैसे भूल सकती हूँ?

आज सम्पन्नता के शिखर पर पहुँच कर
जब वो बीते दिन कि तरफ पलटती हूँ
तो वो परिस्थिति झिझका देती है मुझे

भूख और गरीबी दयु रोजी न करें!!


रचनाकार : परी ऍम 'श्लोक'
Dated : 03/01/2014

बेतहाशा दर्द


आबनूसी उदासियाँ है
पसरी हुई
गाढ़े बेताब से पहर में..

अटकती हुई साँसे
बेलगाम घुटन में..

तुम्हे तलाशो तो केवल
तन्हाई मिलती है

कुछ सोचूं तो याद के अतिरिक्त
कुछ नहीं आवारा मस्तिष्क के जंगल में

आहट डराती हुई सर से निकल जाती है 
दीवार पर लटकी
तुम्हारी तस्वीर आहों से हिलती हैं

बोलती कुछ भी नहीं परन्तु...
 
कैसी विडंबना है ये
मिटाते-मिटाते इक वक़्त के बाद भी
यूँ के यूँ हो तुम अंतरंग में

नाच रही है जिंदगी
मिथ्याभास के डफली पर... 

ऐसे में क्या लिखूं मैं??
अपनी बौराई कलम से

सिवाय बेतहाशा दर्द के !!


रचनाकार : परी ऍम 'श्लोक'
 

तुम बहुत जिद्दी हो ना

तुम बहुत जिद्दी हो ना.........

बच्चो कि तरह हट करना

मुझे ना पा कर रोना,
पा कर मुझसे लिपट जाना

अपनी हसी में समेट ले जाना

मेरे संताप का सिसकता वाकया...

भिगो देना मुझे अपनी ख़ुशी में

रंग देना अपने चहरे के रंग के मुताबिक

पहेलियो के गुनगुने जवाब..

कहानियो का सुंदर अभिप्राय,

कविताओ के ठेठ शीर्षक..

अजब-गजब सी रस टपकाती बातें..

तुमसे जीत पाना ना तो मैं चाहती हूँ

ना ही सम्भव है

आखिर तुम बहुत जिद्दी हो ना......!!


रचनाकार : परी ऍम 'श्लोक'
 

अतीत इक सीख....

सीना तान के खड़ा हो गया है
जहन के अस्थायी खेमे में
इक बार फिर से अतीत का
बहुमुही नुकीला कांच का
बुता हुआ बल्ब....
वर्तमान कि चमक से चिढ़ता हुआ
किन्तु समरण करवा दूँ...
इसके टुकड़ो के दिए जख्म
बेशक कि जिन्दा हैं मुझमे
लेकिन मैं जीना नहीं चाहती इन्हे
मेरे अच्छाईओ को कुरेद कर
अतीत का दीमक उसे हजम नहीं सकता
तुम इक सीख हो मैंने सीखा है तुमसे
वाजिब हर वो बात जो हमें खूबियों के
सांचे में ढाल कर परिवर्तित कर देती है
अब मैं बढ़ चुकी हूँ..घटूंगी नहीं,
मजबूत हो चुकी हूँ..
छलना मुझे सम्भव नहीं
आज या भविष्य के किसी भी
कण मात्र हिस्से को भी नहीं 
छेद कर केवल रिसता हुआ खून मिलेगा
जिसका मिठास तुम्हे वापिस पीछे धकेल देगा
उसी स्थान पर जहाँ से तुम्हे लुप्त हो जाना होगा
तुम्हे देने के लिए मादक मिठास के अलावा...
मेरे पास कड़वाहट भी शेष नहीं!!

रचनाकार : परी ऍम 'श्लोक'
 

Wednesday, January 1, 2014

काश! होती स्वप्न कि सीमा!!!!!!

क्यूँ नहीं होती
स्वप्न कि कोई सीमा?
कल्पनाओ का विराम बिंदु?
क्यूँ होता है ?
उम्मीदो के सुनहरे पंखो का
फैलाव इतना व्यापक ?
जो कुछ पल घेर कर खड़ा हो जाता है
अनायास ही वास्तविकता कि किरच को...
नज़दीकियों के सुवास से
तुम्हारे वादो को सहेजते हुए विश्वास के
सुरक्षित तिजोरी में  
उम्र के ऐसे ही मोड़ पर
करवट लेना शुरू किया था 
इच्छाओ ने मुझमे
लाल-हरी चूड़ियो से भरी
गेहुंए प्रतिबिम्ब कि कलाइयां
महरूनी जोड़ा पहने हुए...
सिन्दूर के रंग में रंगी हुई
देखी थी मैंने स्वप्न कि संपूर्ण गली..
अछूती हो गयी थी यथार्थ से..
कृत्रिम रेशमी सोच के आवरण में लिपट कर..
ये समझ ही नहीं पायी इकपल भी कि
स्वप्न उड़ा ले जाता है भावनाओ को
बिना किसी रोक-टोक ऐसी ही दुनिया में
जहाँ इसके टूटने कि
खनक का भान तक नही रह जाता
ऐसे में काश!
होता स्वप्न को काबू में
रखने वाला कोई पिंजरा
काश!
इसके टूटने पर खेद न होता...
होती इसकी भी कोई निर्धारित सीमा!!    

रचनाकार : परी ऍम 'श्लोक'
 

"विरह"

मैंने तो गहरी

संवेदनाओ का बीज बोया था

आत्मा कि ज़मीन पर 

अंकुरित होकर अब वो

मोहक पौधे का रूप ले चुके थे

निकलने लगे थे उसमे

प्रेम के महकते हुए पुष्प

किन्तु तुमने जोत दिया

आशाओ का खेत

लगा दिया उसमे

विरह के दानवी वृक्ष

और अब

लगातार सींचते जा रहे हो

इसकी जड़ो को कुंठाओ से

भावनाओ को ठूंठ बनाकर !!

रचनाकार : परी ऍम 'श्लोक'
 

शाम होते ही....


मुझे जानना है????

मुझे जानना है?
तो आओ!
ले चलती हूँ तुम्हे
मेरे घर तक...
घर के उस कमरे तक
जहाँ मैं शाम के चंद पल से
सुबह के कुछ पहर तक होती हूँ और
होती है मेरे साथ वो डायरी "परछाई"
जिससे कहती हूँ मैं
मीठी, खट्ठी कड़वी हर बात
खींचती रहती हूँ लकीर पर लकीर
उसके नाज़ुक शरीर पर
उदार श्रोता है वो... 
उससे पूछना मैं कैसी हूँ?
तुम्हे संघनित विवरण देगी
उन दोस्तों, रिश्तो, अज़ीज़ के
और मेरे आत्महित बयान से
या तो उलट या थोड़ा भिन्न
बिना पक्षपात के बताएंगी
तुम्हे अपनी नज़र का सच
नज़रिये का सच 
मेरे व्यक्तित्व के प्रत्येक पहलु का सच!! 

रचनाकार : परी ऍम 'श्लोक'