Wednesday, September 17, 2014

"मधुमास भी अब पतझड़ लगता है"

मधुमास भी अब पतझड़ लगता है
मीठी आवाजो से डर लगता है

 तन्हाई ने अपना तलबगार बना लिया
अब जंगल ये सारा शहर लगता है

जब से सूखी है आँगन कि बेल
घर मुझको पुराना खण्डर लगता है

चढ़ी सर पर और अब तक न उतरी
मुझको तो ये तेरा असर लगता हैं

किससे कहती कि वो लहर थाम ले
हर इंसान दर्द का समंदर लगता है

प्यार कि भाषा कोई समझता नहीं
ये ज़माना मुझे तो अनपढ़ लगता हैं

वो आँखो कि बात समझता कैसे ?
हाल-ए- हलचल से मेरी बेखबर लगता है

कैद हूँ तिलिस्मी किसी पिंजरे में
कटा हुआ दिल परिंदे का पर लगता हैं

जो कह नहीं पाता साफ़-साफ़ कोई बात
उसकी बातो में ही अगर-मगर लगता है

इंसान बड़ी ही पेचीदा चीज़ है यारो
किसी को समझने में पूरा जनम लगता है

मंज़िल खो जाती है जब किसी मोड़ पर
फिर मुश्किल बड़ा ये सफर लगता हैं

बिन कहे ही सब ऐसे समझ जाना
'श्लोक' तेरा गज़ब ये हुनर लगता है

_________ ©परी ऍम 'श्लोक'

19 comments:

  1. बहुत अच्छा लिखा है आपने
    आपने हर एक शब्द को आपने मोतियों से पिरोया है।

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  2. बहुत बढ़िया परी जी

    सादर

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  3. इंसान बड़ी ही पेचीदा चीज़ है यारो
    किसी को समझने में पूरा जनम लगता है

    ​क्या बात है ! गज़ब के अशआर और दमदार भी

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  4. कल 19/सितंबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  5. किससे कहती कि वो लहर थाम ले
    हर इंसान दर्द का समंदर लगता है ! बहुत खूब परी जी !

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  6. बहुत ही सुन्दर रचना बहुत अछा लिखा है

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  7. NICE AS USUAL FROM YOUR PAE..MAY GOD BLESS YOU

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  8. प्यार कि भाषा कोई समझता नहीं
    ये ज़माना मुझे तो अनपढ़ लगता हैं...सुंदर अभिव्यक्ति आदरणिया परी जी!
    धरती की गोद

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  9. प्यार कि भाषा कोई समझता नहीं
    ये ज़माना मुझे तो अनपढ़ लगता हैं
    बहुत खुबसुरत रचना
     पासबां-ए-जिन्दगी: हिन्दी

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  10. इंसान बड़ी ही पेचीदा चीज़ है यारो
    किसी को समझने में पूरा जनम लगता है

    ​क्या बात है !

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  11. मंज़िल खो जाती है जब किसी मोड़ पर
    फिर मुश्किल बड़ा ये सफर लगता हैं ..
    सच लिखा है ... खो जाती हैं जब मंजिल तो सफ़र बेमानी लगता है ...

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  12. अत्यंत सुन्दर लिखा !!!!

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  13. कितना सच है यह कि
    तन्हाई ने अपना तलबगार बना लिया
    अब जंगल ये सारा शहर लगता है

    जब से सूखी है आँगन कि बेल
    घर मुझको पुराना खण्डर लगता है

    चढ़ी सर पर और अब तक न उतरी
    मुझको तो ये तेरा असर लगता हैं

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