ग्वाचा हूँ मैं कहीं ख्वाबो के दरीचों में
अपना पता रात के धुंदलके से पूछता हूँ
अज़ब चाह है मुझको बताएंगे तो हसोगे
मैं मौत के शहर में जिंदगी को ढूंढता हूँ
सबसे जीत कर भी दिल से हार जाता हूँ
अपने इसी खामी से मैं हर रोज जूझता हूँ
आ जाता है सुस्ताने मेरे ख़्यालो के छाँव में
वो याद जिसको वक़्त के गीले कपड़े से पोछता हूँ
तुमसे कहूँगा तो तुम भी ताना कसोगे मुझपे
छिपा के कहीं पे रख लू अपना हाल सोचता हूँ
ग़ज़लकार : परी ऍम 'श्लोक'
अपना पता रात के धुंदलके से पूछता हूँ
अज़ब चाह है मुझको बताएंगे तो हसोगे
मैं मौत के शहर में जिंदगी को ढूंढता हूँ
सबसे जीत कर भी दिल से हार जाता हूँ
अपने इसी खामी से मैं हर रोज जूझता हूँ
आ जाता है सुस्ताने मेरे ख़्यालो के छाँव में
वो याद जिसको वक़्त के गीले कपड़े से पोछता हूँ
तुमसे कहूँगा तो तुम भी ताना कसोगे मुझपे
छिपा के कहीं पे रख लू अपना हाल सोचता हूँ
ग़ज़लकार : परी ऍम 'श्लोक'
No comments:
Post a Comment
मेरे ब्लॉग पर आपके आगमन का स्वागत ... आपकी टिप्पणी मेरे लिए मार्गदर्शक व उत्साहवर्धक है आपसे अनुरोध है रचना पढ़ने के उपरान्त आप अपनी टिप्पणी दे किन्तु पूरी ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ..आभार !!