Wednesday, July 16, 2014

"अपनी जगह ढूँढ लेते हो"

मैं हर वक़्त तुम्हे भुलाने कि कोशिश करती हूँ
तुम हर वक़्त याद आने कि वजह ढूँढ लेते हो ...

मैं तुमको मिटाने को अतीत कि किताब फाड़ती हूँ 
तुम फिर आज के पन्नो में अपनी जगह ढूँढ लेते हो

अपने जख्मो कि जलन को आहो से ठंडा करती हूँ
तुम फिर मेरे खातिर नयी सज़ा ढूँढ लेते हो.. 

सोचती हूँ तुमसे तालुक तोड़ कर फासला बना लूँ
मगर तुम मेरे कदमो के निशान ढूँढ लेते हो..

मैं मुस्कुरा के अगर सुबह के दहलीज़ पे दस्तक दूँ
तो तुम दर्द का फिर इक नया सिलसिला ढूँढ लेते हो..

आईने के शक्ल में पहले मुझे इत्मीनान से तराशते हो
फिर तोड़ देने को पत्थर भी......बड़ा ढूँढ लेते हो !!



---------------परी ऍम 'श्लोक'

7 comments:

  1. बहित खूब परी जी


    सादर

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  2. सोचती हूँ तुमसे तालुक तोड़ कर फासला बना लूँ
    मगर तुम मेरे कदमो के निशान ढूँढ लेते हो..
    बहुत लाजवाब ... प्रेम में फांसले बनाना आसान कहाँ ... दिल से दूर होना भी आसान नहीं ...

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  3. दिल से लिखी ..सुन्दर रचना .....
    मेरे ब्लॉग पर आपका स्वागत है

    संजय भास्कर
    हरियाणा
    http://sanjaybhaskar.blogspot.in

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  4. मैं तुमको मिटाने को अतीत कि किताब फाड़ती हूँ
    तुम फिर आज के पन्नो में अपनी जगह ढूँढ लेते हो

    अपने जख्मो कि जलन को आहो से ठंडा करती हूँ
    तुम फिर मेरे खातिर नयी सज़ा ढूँढ लेते हो..
    क्या बात है !

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  5. Aap sabhi ka tahe dil se shukrgujaar hun.....bahut shukriyaa...

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