Thursday, July 24, 2014

प्रेम-कहानी

कबसे उस क्षण की
प्रतीक्षा में बैठी थी
और बुने जा रही थी
मन ही मन
इन्द्रधनुष के रंगो से स्वेटर।

डाले जा रही थी
प्रेम के दिए में 
आशाओ का तेल। 

कि कभी तो
मनचाहा अंत होगा
मेरी प्रेम कहानी का भी
कभी तो इन
दहकते सिसकते लम्हों पर
डाल पाउंगी
संतोष का ठंडा पानी
कभी तो लिख पाऊँ मैं
सच्चे प्रेम के निर्मल भाव
जिसके कोमल शब्दों से 
रस टपक रहे होंगे। 

परन्तु मेरी हर आशा टूट गयी
हर दुआ बेअसर रही।

धड़कनो के रंगमंच पर
जिस कहानी का शुभारंभ
तुमने किया था 
उस पर पर्दा गिरा कर 
तुमने इस कहानी को
सुन्दर अध्याय देने कि
सारी संभावनाएं ही खत्म करदी। 

---------परी ऍम 'श्लोक'
 

10 comments:

  1. बहुत सुंदर प्रस्तुति !

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  2. बहुत ख़ूबसूरत रचना परी। उम्मीद का दामन न छोड़ना कभी।

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  3. उमीद हरी रहना चाहिए ... पर्दा दुबारा भी उठता है ....

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  4. निशब्द करती रचना.....
    बेहद खूबसूरत पंक्तियां.... आमीन...!!!

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  5. आपकी लिखी रचना शनिवार 26 जुलाई 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  6. बहुत ही बढ़िया


    सादर

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  7. वाह परी जी बहुत ही खूबसूरत रचना

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