Monday, July 14, 2014

"खामोशी के बाद का तूफ़ान"

मेरे विरोध के लिए 
माँ ने भी मेरी पीठ
कब थपथपाई है
वो बोली
कि खता किसी कि भी हो
समाज ने औरत पे ही
उंगली उठायी है। 

कल किसी ने मुझे छेड़ा
मैंने उसे थप्पड़ जड़ दिया
अफवाह यूँ फैली कि
भाभी भी जुबान पे
सौ सवाल उठाकर ले आयी है।

किसी के साथ देखा
तो बवाल बना दिया
जैसे मेरी इज्जत
किसी के घर कि जमाई है।

घर से बाहर निकलू
तो जन-जन को खटकु
समझ नहीं आता कि आखिर
मैं कौन सी सीमाएं
अपनी नाँघ कर आयी हूँ।

चुप रहूँ तो मैं अच्छी बेटी
सब सहूँ तो अच्छी बहु
जुर्म सहकर भी उर्फ़ न करूँ
तो अच्छी पत्नी
कौन है वो अनपढ़
जिसने ये
नियमावली बनायी हैं।  

जाओ बदलती हूँ
बरसो से मेरे हक़ में
खींची ये लकीर।

मैं हूँ विरोधी
विरोध करती रहूंगी
अपने कदमो तले
हर ज्यातिति कुचलती रहूंगी। 

ये खामोशी के बाद का तूफ़ान है
कहाँ कभी कोई चट्टान
फिर तुफानो को रोक पायी है।!!

------------परी ऍम 'श्लोक'

 

3 comments:

  1. बहुत बढ़िया

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  2. आपकी नज्म़ पढ़ते-पढ़ते एक शेर निकल आया आपकी नज्र करता हूं-

    जितनी जंजीरें हैं उनपर चोट करेगा.
    वो बारूद का पुतला है, विस्फोट करेगा.

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