Sunday, July 27, 2014

बे-अल्फ़ाज़ खत

हमारे बीच
इक खामोश रिश्ता है
जो इतना गहरा और मज़बूत है
जिसे न तो काटा जा सकता है
और ना ही इसकी जड़ो कि
गहराई का अंदाज़ा
लगाया जा सकता है...

दूर होकर भी
इतने करीब हो
कि तुम सांस लेते तो
मैं महक उठती हूँ...

अब तुम्हे
क्या लिखूं इस खत में
समझ नही आता
या यूँ कहूँ
अल्फ़ाज़ नहीं मिलते
अपने जज्बातों को
उनकेरने के लिए... 

ये खाली पन्ना है
भेज रही हूँ
अपने नाम के साथ
जब इसमें कोई अक्षर
न नज़र आये
तो समझ जाना
इसकदर प्यार है तुमसे
कि शब्दकोष में वो शब्द नहीं
जिसे लिख के जता सकूँ
अपने भीतर के
उमड़ते एहसास तुम्हे ..

पढ़ लेना तुम
ख़ामोशी की भाषा
जो दिल से दिल तक का
सीधा संचार है !!

---------------परी ऍम 'श्लोक'

10 comments:

  1. पढ़ लेना तुम
    ख़ामोशी की भाषा
    जो दिल से दिल तक का
    सीधा संचार है !!
    वाह.... सुन्दर भावाभिव्यक्ति

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  2. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण प्रस्तुति...

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  3. खूबसूरत अभिव्यक्ति...बधाई

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  4. मन की एहमियत समझ सकने वाला ही
    पढ़ सकता है बे अल्फ़ाज़ खत
    जिसके कोने कोने पे बिखरी हो
    उसके नाम की इबारत..................... :)

    सादर

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  5. आपकी लिखी रचना बुधवार 30 जुलाई 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  6. प्रेम की भाषा की मौन की भाषा है ... इसको पढना कहाँ मुश्किल होगा ...

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  7. कहिए सब मेरो हिया तोरे हिय सों बात
    कागद पर लिखत न बनत ,कहत सँदेस लजात !

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  8. जब इसमें कोई अक्षर
    न नज़र आये
    तो समझ जाना
    इसकदर प्यार है तुमसे
    कि शब्दकोष में वो शब्द नहीं
    जिसे लिख के जता सकूँ
    अपने भीतर के
    उमड़ते एहसास तुम्हे ..

    वाह बहुत ही खूबसूरत,

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  9. बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

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  10. वाह ! बहुत ही सुन्दर !

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