Monday, July 7, 2014

"खुदको हमदर्द कहने वाले यूँ रूठ गए"

खुदको हमदर्द कहने वाले यूँ रूठ गए...
नजाने हम कहाँ रिश्तो में चूक गए....

घर बना के मन कि झूलती शाख पे वो..
लगा के माचिस फिर उसी को फूंक गए...

सबके उम्मीदों को हरा करने में 'श्लोक'...
नजाने कब सपनो के बाग़ सूख गए...

सबको मनाने में और अहमियत देने में..
खुद के मायने ही बहुत पीछे छूट गए...

दर्द में भी मुस्कुराने कि आदत में..
आंसू सब्र कि समंदर में कहीं डूब गए..

जिंदगी क्या सौपी हमने उनके हाथो में ...
वो सम्मान मेरे हक़ के सीमांतो से लूट गए..

वक्त को मुट्ठियों में लेकर हम थे चलने वाले ...
झूठे नियमो कि आंधियो से पात सा टूट गए..


 --------------परी ऍम 'श्लोक'

9 comments:

  1. भावनाओं की चासनी और अपनेपन की खुशबू में लिपटी शब्दों की मिठाई !

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  2. बहुत खूब परी जी।

    सादर

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  3. जिंदगी क्या सौपी हमने उनके हाथो में ...
    वो सम्मान मेरे हक़ के सीमांतो से लूट गए..

    बहुत खूब

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  4. बहुत सुन्दर रचना......

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  5. दर्द में भी मुस्कुराने कि आदत में..
    आंसू सब्र कि समंदर में कहीं डूब गए
    बहुत सुन्दर भाव

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  6. सबको मनाने में और अहमियत देने में..
    खुद के मायने ही बहुत पीछे छूट गए...
    सच के बहुत करीब है ये शेर ... लाजवाब ग़ज़ल ...

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  7. Aap sabhi ke tippniyo ke liye saadar aabhar... Hum aasha karge hain aap sabhi aadarniye hamare hosale ko apne tark vitark se badhaate rahenge hame padhte rahenge ..... Meri kavitaa k shabdo ko sarthak karne ke live dhanywad...

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  8. खुद के मायने ही बहुत पीछे छूट गए...
    सच के बहुत करीब है ये शेर ... लाजवाब ग़ज़ल ...

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