Tuesday, July 8, 2014

"बेउम्मीदी को कहीं गुमराह कर देते हो तुम"

 
बेउम्मीदी को कहीं गुमराह कर देते हो तुम..
दुःख मेरे हिस्से का अधमरा कर देते हो तुम..
 
कभी कभी जला के ख़ाक कर देते हो मुझे..
तो कभी कभी नया-नया सा कर देते हो तुम..
 
नजाने क्या है मगर कोई मीठा सा अहसास है..
मुझे छूकर मुझमें जिसे रवा कर देते हो तुम..
 
जहाँ भी देखूं तेरी ही झलक मिलती है मुझे..
हर ज़र्रे को अपना आइना कर देते हो तुम..
 
मुझे ठेस लगने से पहले ही मेरे जख्मो की..
हर दफा आकर मेरी दवा कर देते हो तुम..
 
मेरी ओर आने वाली तमाम मुश्किलो को..
मेरी चौखट से ही रफा-दफा कर देते हो तुम..
 
मतलब परस्त दुनिया में जब कहते हो कि तुम मेरे हो..
मेरी खुशियाँ कई गुना कर देते हो तुम ..
 
कदम-कदम पे अपनी बेपनाह वफाओ से..
रिश्तो के असर को और गहरा कर देते हो तुम..
 
अपनी नज़र से मुझको नूर बक्शते हो...
मेरे रंग रूप को जैसे कि अप्सरा कर देते हो तुम..
 
मेरे हर वक़्त को अपना हिस्सा देकर..
जिंदगी का हर लम्हा बेहद महंगा कर देते हो तुम !!
 
-----------------------परी ऍम श्लोक

13 comments:

  1. लाजवाब रचना


    सादर

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  2. आज 09 /जुलाई /2014 को आपकी पोस्ट का लिंक है http://nayi-purani-halchal.blogspot.in (कुलदीप जी की प्रस्तुति में ) पर
    धन्यवाद!

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  3. बहुत खूबसूरत ग़ज़ल। प्यार के भावो से बिगते शब्द
    । क्या बात है।

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  4. सुंदर रचना, ऐसा हमसफ़र सभी को मिले.

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  5. वह क्या बात ... लाजवाब ग़ज़ल ...

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  6. बहुत सुन्दर.....

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  7. शब्दों की अनवरत खुबसूरत अभिवयक्ति...

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  8. शब्दों की अनवरत खुबसूरत अभिवयक्ति...

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  9. ​बहुत ही सुन्दर लाजवाब

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