Tuesday, July 29, 2014

मेरे होने का प्रमाण

मालूम नहीं .........

कौन है ? क्या है ?

कहाँ हैं ?

मगर
फिर भी है
इंतज़ार.....

और
जब भी
ये इंतज़ार
मद्धम पड़ने लगता है

तो
उठता है
सवाल
मेरे होने पर

ह्रदय
जिसका उत्तर
निसंकोच देकर
मुझे आत्मीय
शान्ति देता है

कि
तुम्हारा होना ही तो
मेरे होने का प्रमाण है !!


---------------परी ऍम 'श्लोक '

4 comments:

  1. व्यष्टिवाद और समष्टिवाद के द्वन्द के बीच मुखरित सुन्दर एवम् अनुभूतिपरक लेखन

    जीवन की आपा धापी में लगता
    अस्तित्वबोध का भाष्य सरल है
    अनुभूतिपरक सन्दर्भ की भाषा
    कहीं ठोस तो कही तरल है
    मधुमिश्रित आमन्त्रण भी है
    कभी सुधा तो कभी गरल है
    अज़ीज़ जौनपुरी

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  2. बहुत बढ़िया

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  3. अति सुन्दर !
    तुम्हारा होना ही तो
    मेरे होने का प्रमाण है !!
    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ !

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