Wednesday, August 13, 2014

"कितने गिले हैं"

इस जिंदगी से कितने गिले हैं
ठहरे जो दिल में वो बिछड़े हैं

जो ख़्वाब सजाया शिद्दत लगा के
टुकड़े उन्ही के अक्सर चुभे हैं

हँसते हुए जब लगते हैं अच्छे
फिर गम के साये क्यूँ लिपटे हुए हैं

क्या सीख कर पाया हैं हमने
अपने ही तर्ज़ुर्बो में खुद जले हैं

किसको सुनाते हम अपनी कहानी
हर इंसान अपनी धुन में चले हैं

अपनी भी ऐसी रही जिंदगानी
समंदर थे हम और प्यासे रहे हैं

कैसे पा लेते भला पूरी कायनात
जब खुद ही ताउम्र अधूरे रहे हैं

उसको याद होंगे हम सोचे भी कैसे
हिचकियों को आये हुए अरसे हुए हैं

जिनके लिए बेचे थे अरमान अपने
उनके ठोकर में हम अब खुद पड़े हैं

वक़्त की आंधी से टकरा के 'श्लोक'
हम तिनके से हर ओर बिखरे पड़े हैं


______________परी ऍम श्लोक

6 comments:

  1. वाह बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति

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  2. बहुत ही बढ़िया


    सादर

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  3. आपकी इस रचना का लिंक दिनांकः 15 . 8 . 2014 दिन शुक्रवार को I.A.S.I.H पोस्ट्स न्यूज़ पर दिया गया है , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  4. मन को छूती भावुक रचना
    बहुत सुन्दर
    उत्कृष्ट प्रस्तुति
    सादर --


    आग्रह है --मेरे ब्लॉग में भी सम्मलित हों
    आजादी ------ ???

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