Saturday, August 16, 2014

प्रश्न ??????


जब सब लोग लिख रहे थे
स्वतंत्रता दिवस पर
लेख और रचना
मैंने भी लिखी थी चंद पंक्तियाँ

लेकिन
एका एक मेरी कलम रुक गयी
जैसे सुस्ताना चाहती हो
कुछ वारदात मेरे जेहन में उतर आये
और मेरी अंतरात्मा तक कर्राह उठी  

लेकिन उस वक़्त मैं चुप रही
अपनी कलम को थपथपा के सुला दिया
सुस्ताने का समय दिया 
क्यूंकि उस वक़्त अगर लिखती
तो शायद !
शब्द गुस्से में मर्यादा लाँघ जाते
जो मैं नहीं चाहती थी

उस वक़्त मैंने नहीं रोका
किसी भी ख्याल को आने-जाने से
खोल दिया दरवाज़ा और स्वागत किया
हर पीड़ादेह सिलसिले का

सोचती रही
कि क्या वाकई में आज़ादी
मेरे हिस्से में भी आई है
आज़ाद हुआ था जब देश
तो खुश हुई मैं भी कितनी
कितनो ही नारियो कि
भागेदारी रही इस आज़ादी कि लड़ाई में
आखिरकार आज़ादी मिली
पर मुझे समाज के नियमो ने
फिर बंदी बना लिया

मैं लड़ी
कभी दहेज़ प्रथा के लिए
तो कभी जली परंपरा कि इस आग में
मेरी आवाज़ को दबाने में जुटा रहा समाज
मैं न बोलूं तो गरिमा में हूँ
कुछ बोलूं तो घर कि इज्जत चली जाती रही
खुद को घूँघट में समेटे हुए
दुनियाँ को जी भर को देखने तक को तरसी
कितनी तड़पी,,,कितनी बरसी
और आँचल से पोंछ लिया अपना दर्द
कहती तो किससे
बात घूम फिर के आती रही
औरत का यही जीवन है

धीरे-धीरे तोड़ा मैंने
इन ज़ंज़ीरो का लौहा 
हौसलों से रेत कर कमज़ोर कर दिया
उठी और
कन्धा मिला के चलने लगी
दिखाया अपना दम्य
कि हम चूल्हा चौके से बाहर निकल
कंप्यूटर में उंगलियां फेरे...
चाँद पर जाए तो..एवरेस्ट पर चढ़े
तो इतिहास लिखा करते हैं

लेकिन खुशियो के इन करवाह के साथ चला
मन कि नसों को काट कर खून-खून करता दौर
जब मारे जाने लगी बेटियां कोख में
जब रेप होने लगा हर बाइस मिनट में
जब औरत घरेलु हिंसा के चुंगल में
नोची, घसोटी गयी, बेआबरू हुई,
मानसिक तौर पर प्रताड़ित कि गयी
जब ऑनर किलिंग ने कंपकंपाया
बेटियो कि तस्करी ने कलेजा छील दिया
जब तेज़ाब कि शिकार हुई
नजाने कितनी ही मासूम 
जब बाहुबलियों ने कुचला
निर्बल पक्ष कि स्त्रियों का 
बार-बार मान सम्मान

ऐसे में मैं सोचूं तो सोचूं कैसे ?
कि आज़ाद हूँ मैं
मेरे लिए आज भी
ये शब्द प्रश्नचिन्ह के घेरे में हैं
हाँ !
आज़ाद है देश
आज़ादी हूँ मैं भी संविधान में लिखित तौर पे
तमाम कानून है मेरे हक़ में
किन्तु वास्तविकता से कैसे मुँह फेरु
कि गुलाम बन के रह गयी हूँ मैं डर कि
गंदे कुंठित समाज के कीड़े मकौड़ों से
जो इतने जहरीले हैं जिनका ज़हर
मेरे अस्तित्व को जीता जागता लाश बना देता है
लगता है डर वीरान..सुनसान जगहों से
मुझे हर जगह महसूस होती है असुरक्षा

तो क्या सच में कहूँ ?
आज़ाद हूँ मैं ?? या कहूँ कि गुलाम हूँ मैं ??
काश ! कि ये दुविधा ख़त्म हो !!

________________परी ऍम श्लोक

12 comments:

  1. मार्मिक सत्य बयान करती सशक्त प्रस्तुति !

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  2. True and nicely written. . . . .

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  3. आज़ाद हूँ मैं ?? या कहूँ कि गुलाम हूँ मैं ??
    .... एक सच जो कई बार मन का भ्रम तोड़ देता है
    कोई कितना भी समझाये ये
    मन की कह लेता है

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  4. उम्दा प्रस्तुति

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  5. सुंदर प्रस्तुति , आप की ये रचना चर्चामंच के लिए चुनी गई है , सोमवार दिनांक - 18 . 8 . 2014 को आपकी रचना का लिंक चर्चामंच पर होगा , कृपया पधारें धन्यवाद !

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  6. जाने कैसी विडंबना है ..... वास्तविकता बड़ी कटु है आज भी ...

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  7. शब्द नहीं हैं कहने को...
    साधना वैद जी से सहमत...
    सार्थक प्रस्तुति...

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  8. शब्द गुस्से में मर्यादा नाँघ(लाँघ) जाते

    एक बेहतरीन पेशकश...वाह

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  9. सुन्दर, सटीक व सार्थक अभिव्यक्ति।

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  10. यह प्रश्न और दुविधा जायज़ है।

    सादर

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