Sunday, December 29, 2013

सहमी हुई औरत

सहमी हुई औरत
ठण्ड में भी पसीने से भीगी हुई
रात के अंधेरो में छिप रही थी
तारो कि ग़ुम रोशनी से 
लपेटती हुई साफे से शरीर
डरी हुई अवस्था में
कांपता सा देखा उसको
रो रही थी पर बिना आवाज़ के
मुँह को बांधे हुए हाथो से 
सन्नाटो से जैसे कोई दुश्मनी हो
चिपकी जा रही थी 
१२ इंच के लाइट पोल से
चुम्बक कि तरह..
पर इतना डर क्यूँ था उसे ?
और किससे ?
अचानक कदमो कि आहट सुनी 
आदमियो का इक गुट
जानवरो कि तरह भागता हुआ
भूखे भेड़िये फिर रहे हो जैसे
शब्द: कहाँ गयी?
ढूंढो माल अच्छा है..
सुन कर वो औरत
और असहज हो गयी
पर फिर भी टिकी रही
बिना हिले उसी जगह
ओह !
ये दशा..
नज़ाने कब सुरक्षित होगी औरत?
इस धरा पर...
हैवान पुरुषो आखिर कब छोड़ोगे तुम?
ये घृणित अपराध.......................................

रचनाकार : परी ऍम 'श्लोक'
 

8 comments:

  1. कल 25/जुलाई /2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  2. हृदयविदारक !

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  3. हैवानियत को सबक भी औरत ही सिखायेगी
    एक दिन मजबूती से खड़ी हो जायेगी ।

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  4. बहुत ही मार्मिक चित्रण परी जी। जाने कब थमेगा यर घिनौना कृत्य।

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  5. मार्मिक अभिव्यक्ति

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  6. Aap sabhi ka hardik dhanywad apne vichaaro se avgat krwaane ke liye...

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