Thursday, December 12, 2013

तिनका



इक झोंका आया हवा का
उड़ाते हुए मुझे तिनके सा
ज़मीन से पहाड़ कि छोटी तक ले गया,
फिर पुरे आसमान में घुमाया!
परिंदे कि तरह
खवाइशो के पंख लगा मैं इतराती रही
तब तक जब तक वो साथ था
मुझे उठाये हुए अपने हथेलियो पर!

मैं शाख से टूट चुकी थी
लौटने कि चाह नहीं थी मुझमे,
अब वो हवा उसका एहसास और मैं!
बेरहम बेमौसमी बारिशो ने क्रूर रूप लिए
घटाओ के साथ यूँ बरसना शुरू किया कि
फिर से मुझे मिटटी कि कई परते चढ़ा सतह के
इतना अंदर दाब दिया कि अब
तूफ़ान भी वो ताब नहीं रखता जो मुझे
जगा के ले चले सफ़र में!

नहीं है मुझमे उठ कर चलने कि हिम्मत
मैं अपाहिज़ हो चुकी हूँ!
 
जाने क्या था ये ?
जिसने कुछ ही लम्हो में इतना बदलाव ला दिया था मुझमे
संत्रास ला दिया था मुझमे
क्या था ये आखिर ?

मेरा हल्कापन
या
फिर उस हवा कि ताकत?


रचनाकार: परी ऍम 'श्लोक'
12/12/13

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