Tuesday, December 10, 2013

"बेवा हुई रौनकों का चेहरा आफ़ताबी देखिये"





बेवा हुई रौनकों का चेहरा आफ़ताबी देखिये..

शब्दो में सिमटे हुए दावे किताबी देखिये..



जल रहा पूरा शहर मज़हबी हिंसा कि आग में..

दंगे के बाद नेताओ के रुतबे नवाबी देखिये,



इस व्यवस्ता का दोष न दे तो बताओ क्या करें..,

चल के गरीबो के घर का रोटी-पानी देखिये..,



घूस देकर नौकरी मिल जाती है शख्स ठूंठ को..

लोकतंत्र है देश में फिर भी खराबी देखिये..,



सारे बैंक ठस हुए काले धन को ठूस-ठूस कर..

महंगाई के नाम पर जनता कि लुटाई देखिये..,
 
 
ग़ज़लकार : परी ऍम 'श्लोक'
11/12/13

3 comments:

  1. बहुत सुन्दर आकर्षक रचना....

    ReplyDelete
  2. इस व्यवस्ता का दोष न दे तो बताओ क्या करें..,

    चल के गरीबो के घर का रोटी-पानी देखिये..,
    सच्चाई बयान करते सार्थक शब्द

    ReplyDelete

मेरे ब्लॉग पर आपके आगमन का स्वागत ... आपकी टिप्पणी मेरे लिए मार्गदर्शक व उत्साहवर्धक है आपसे अनुरोध है रचना पढ़ने के उपरान्त आप अपनी टिप्पणी दे किन्तु पूरी ईमानदारी और निष्पक्षता के साथ..आभार !!