Thursday, December 26, 2013

कशमकश

उफान है जो अपनी
सीमाओ से भटक गया है
सतह कि रेत इसमें घुल गयी
चट्टान भी बह चला
मिश्रित होता रहा कंकर-पाथर
जज्बात का इक परत नीला था
जैसे जहर मल के धोया हो किसी ने
खला तो बहुत सोचा सोख लूँ
पर औकात थी तिनके सी
आहिस्ता-आहिस्ता खलल
गुमेच देती है निचोड़ देती है
मैं काबिल बनती इक पल
अगले पल बेकाबू हो जाती
वो जोश में था या गुस्साया था
उछलता, गिरता, सम्भलता
सब घसीटता हुआ बढ़ता रहा
मैं भी आयी तिनके सी
पढ़ना चाहती थी उसे
वो बोला मैं सुन सकी....
खामोशियाँ सवाल बनाती गयी
और मैं डूबती चली गयी ..
 
कभी खतम होने वाले कशमकश में!!

 रचनाकार : परी ऍम 'श्लोक'
27/12/2013… 2:32 AM

3 comments:

  1. कल 27/अगस्त/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  2. बहुत सुन्दर...

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